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    This blog is part of the series #OneSouthAsia exploring how South Asia can become a more integrated, thus more economically dynamic region. The blog series is a  lead up to the South Asia Economic Conclave, an event dedicated to deepen existing economic links through policy and investments in regional businesses.

    Which South Asia do you live in? The one which offers world-class metros and malls, super-specialty hospitals, gourmet eateries and designer homes where servants make your meals, drive your car or clean your mess? 

    Or do you live in the South Asia where sanitation, water and electricity are a luxury, where filth, ignorance and violence means death comes early and more frequently from illness, poverty and natural disasters? Statistically, the latter is more likely.

    Having lived in Southeast Asia, where the emergence of the Tigers has transformed the lives of millions of poor through investment in human development, infrastructure and exports producing high growth rates, the visible poverty and chaotic streets of South Asia are troubling. So, too, is the contrast provided by India's dollar billionaires -- the third-largest rich man's club in the world.


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    An Indian woman cooking. Photo credit: Romana Manpreet and Global Alliance for Clean Cookstoves


    यह एक सच्‍चाई है: लकड़ी, चारकोल, कोयले, गोबर के उपलों और फसल के बचे हुए हिस्‍सों सहित ठोस जलावन (सॉलिड फ्यूल) की खुली आग और पारंपरिक चूल्‍हों में खाना पकाने से घर के भीतर होने वाला वायु प्रदूषण दुनिया में, हृदय और फेफड़ों की बीमारी और सांस के संक्रमण के बाद मृत्‍यु का चौथा सबसे बड़ा कारण है।

    लगभग 290 करोड़ लोग, जिनमें से ज्‍़यादातर महिलाएँ हैं, अभी भी गंदगी, धुआँ और कालिख- पैदा करने वाले चूल्‍हों और ठोस जलावन से खाना पकाती हें। हालत यह है कि इतने ज्‍़यादा लोग इन खतरनाक उपकरणों का इस्‍तेमाल कर रहे हैं जो भारत और चीन की कुल आबादी से भी ज्‍़यादा हैं।   

    इसे बदलने की जरूरत है। और बदलाव हो रहा है जैसा कि मैंने पिछले सप्‍ताह में एक्‍रा, घाना में संपन्‍न क्‍लीन कुकिंग फोरम 2015की कई बातचीतों को सुना। घाना के पेट्रोलियम मंत्री और महिला व विकास उपमंत्री की बात सुनकर, मुझे अहसास हुआ कि सर्वाधिक जरूरतमंद परिवारों को स्‍वच्‍छ चूल्‍हे व स्‍वच्‍छ ईंधन उपलब्‍ध कराने की गहरी इच्‍छा निश्चित रूप से यहाँ मौजूद है। लेकिन इच्‍छाओं को सच्‍चाई में बदलना एक चुनौती है। यह बात न केवल घाना में बल्कि दुनिया के कई हिस्‍सों के लिए भी सही है।

    बाद में मैंने इस बारे में काफी सोचा खास तौर पर जब हमने पेरिस में होने वाली जलवायु परिवर्तन कॉन्‍फ्रेंस (सीओपी21) पर ध्‍यान दिया जहाँ दुनिया के नेता जलवायु परिवर्तन के दुष्‍प्रभाव कम करने के वैश्विक समझौते पर सहमति बनाने के लिए इकट्ठा होंगे। उस लक्ष्‍य तक पहुंचने की एक महत्‍वपूर्ण कुंजी ऊर्जा के स्‍वच्‍छ स्रोतों को अपनाना भी है। इस लिहाज से, संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ का सस्‍टेनेबल एनर्जी गोल (एसडीजी7)का एक मकसद - किफायती, भरोसेमंद, वहनीय (सस्‍टेनेब‌िल) और आधुनिक ऊर्जा तक सभी की पहुंच सुनिश्‍च‌ित करना - यह भी है कि ऐसे 290 करोड़ लोगों तक खाना पकाने के स्‍वच्‍छ समाधान पहुंचाएँ जाएँ, जो आज उनके पास नहीं हैं।  


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     Barbara Minguez Garcia 2018
    When it comes to their heritage buildings, both Bhutan and Japan have one common enemy: Fire. A view of Wangduephodrang Dzong in Bhutan which was destroyed by fire in 2012. Credit: Barbara Minguez Garcia 2018

    About 2,749 miles, three countries, and a sea separate Kyoto, Japan, and Thimphu, Bhutan. The countries’ languages are different, and so are their histories.

    But when it comes to their heritage buildings, both nations have one common enemy: Fire.

    And to help prevent fire hazards, there’s a lot Bhutan can learn from Japan’s experience.

    To that end, a Bhutanese delegation visited Tokyo and Kyoto last year to attend the Resilient Cultural Heritage and Tourism Technical Deep Dive to learn best practices on risk preparedness and mitigation, and apply them to Bhutan’s context.

    Such knowledge is critical as Bhutan’s communities live in and around great heritage sites.


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